Monday, November 18, 2013

Jara Muskurao To ...

One more of the few childhood poems revisited :), this was published in local newspaper and I was honored to receive letter from editor to never stop writing. I was 15 then and hence started the mad rush of education and for some reason my mind got completely wiped off of creative outburst!

बचपन के पन्नो से मेरी एक कविता, मुस्कान से करती है आपका अभिनन्दन । 

जरा मुस्कुराओ तो !!

एक मुस्कान से हो जाती हैं सारी मुश्किलें आसान ,
जैसे, एक फूल के खिलने से बढ़ती  है बगीचे की शान। 
लगता है ये दुनिया तो है बच्चों  का खेल, 
जो है आसान हर एक लिए, चाहे हो बूढ़ा या जवान। 

एक मुस्कान से मिलती है ज़िन्दगी को दिशाएँ अनेक ,
हर उलझन सुलझ जाती है, जैसे हो कोई  सपनो का देश  । 
ले जाती है  हमें ज़िन्दगी के उस छोर पे ,
जहाँ साथी  मिलते हो विभिन्न  भेष में  । 

है मुस्कान में इतनी गर्मी ,
कि नर्म  कर दे शीत  की  कठोरता को , 
है इसमें इतनी शक्ति कि ,
दे नव उत्साह  हर एक थके हुए दिल को ।  

मुस्कुरा के कर लो अपनी ज़िन्दगी हरी भरी ,
जहाँ खिले हर रंग के फूल, पर कभी रहे न तेरा बगीचा खली । 
हर सुबह मुस्कुरा कर करे तेरा अभिनन्दन,
हर शाम मुस्कुरा के ले तुझसे  विदाई । 

                                                          -अदिति मोहन 

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